मन्त्रों का उद्भवकाल क्या है ? ये कब रचे गये ? किसने इनकी रचना की? शायद, यह बात कोई नहीं जानता। फिर भी इनके निर्माणकर्ता ऋषि मुनियों को ही माना जाता है। यदि ऋग्वेद को, आर्य जाति का प्राचीनतम् ग्रन्थ स्वीकार किया जाये तो, इनमें तो मन्त्रों का अति विकसित रूप उपलब्ध है। इससे यह बात तो प्रमाणित होती ही है कि मन्त्र रचना का काल, वेदों से भी पहले का है। ऋग्वेद ही नहीं, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद में भी मंत्र, अति विकसित रूप में पाये जाते हैं। ग्रन्थ, संहिता, अरण्यक व उपनिषद् तो हैं ही वेदों के बाद की रचनायें । अतः, इनमें मन्त्रों का विकसित रूप पाया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। विश्व . की कोई भी ऐसी जाति नहीं है। जिसे मन्त्रों का ज्ञान न हो। जिसके विद्वतजन, इसकी शक्ति से अनभिज्ञ हों। परन्तु आजकल इस ज्ञान की कमी पाई जाती है। कलियुग के प्रारम्भ काल में, इस विद्या का चरम विकास था। ऋषि-मुनि भी इस विद्या के अच्छे ज्ञाता थे। उन्होंने ही इस विद्या का चरमो विकास किया था। ऋषि-मुनियों के बाद यह विद्या, सिद्धि-साधकों व मर्मज्ञ विद्वानों के पास आकर फलने फूलने लगी। परन्तु, आज इस विद्या के ज्ञाता साधकों की इतनी कमी है कि इनको अंगुलि पर गिना जा सकता है। फिर भी लोगों में इस विद्या का प्रभाव कम नहीं है। आज भी लोग, काम की सफलता, परीक्षा, प्रतियोगिता व चुनाव विजय तक में, मंत्र-तंत्र व हवन यज्ञ का सहारा लेते हैं। चुनाव कब हों, कागज़ कब दाखिल किये जायें, शपथ कब ली जाये, मन्त्री कब और कितने लिये जायें। यह सब ज्योतिष और तान्त्रिक तय करते थे। राजीव गांधी, नरसिम्हा राव तथा वर्तमान प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इससे पीछे नहीं रहे। इंग्लैंड तथा अमेरिका के राष्ट्रपतियों व प्रधान मंत्रियों तक ने इस मंत्र विद्या का लाभ उठाया। बहुत से मन्त्री, मुख्य मंत्री, राज्यपाल व राष्ट्रपति भी ज्योतिष व तान्त्रिकों के आगे अपना शीश झुकाते हैं। कहने का भाव यह है कि जनता पर शासन करने वाले शासक भी, ज्योतिषियों के दरबार में अपना शीश झुकाते रहते हैं। कुछ यह काम सरेआम करते हैं, तो कुछ रात के अन्धेरे में अपना काम करते हैं। उन्हें अपने से अधिक ज्योतिषियों पर विश्वास है। एक समय था। जब भारत वर्ष में, यंत्र-मंत्र-तंत्र तथा जादू का बोल बाला था। जादू की विद्या का अत्यधिक प्रचार था। यहाँ एक से बढ़ कर एक सिद्ध योगी, महात्मा, तान्त्रिक व जादूगर बहुतायात में पाये जाते थे। जिनके हाथों में सब कुछ कर दिखाने की चमत्कारिक शक्ति विद्यमान रहती थी। पहले के मर्मज्ञ विद्वान, बिना जाति भेद किये, इस विद्या के सिद्धि प्राप्त इन्सान थे। आज भी यह विद्या नुप्त नहीं हुई है। तो भी, इसके विज्ञ (जानकार) भले ही हज़ारों या लाखों की संख्या में मिल जायें। परन्तु, मर्मज्ञ विद्वानों, ज्ञाता विशेषज्ञों का सर्वथा अभाव है। यानि, सिद्धि प्राप्त ज्ञाताओं की बहुत ही कम है। इसीलिये सरल हिन्दी भाषा में, इस छोटी सीप बहुत ही काम की पुस्तक को लिखने का विचार मेरे मन में आया। शिष्य परम्परा व पूर्वजों से धरोहर में, जो भी यंत्र-मंत्र व तंत्रज्ञान मिला। सारे का सारा तथा अपने अनुभव से जो पाया, पाठकों को कर रहा हूँ। अस्तु, साधकों को निश्चित सफलता मिले। इसी उददेश्य सामने रखकर, इधर-उधर से मंत्र-तंत्र व यंत्रों को इक्ट्ठा नकाते इस पुस्तक को वृहदाकार देने की अपेक्षा, संक्षिप्त परन्तु सारगर्भित पस्तव पाठकों को दे सकूँ यह सार्थक प्रयास किया गया है। पाठक इससे लाभ उठाकर, दूसरों का भी भला कर सकें, तभी मेरा प्रयास व साधना सफल होगी। साधक की साधना सच्ची हो तो फल अवश्य मिलता ही है।

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