जीवन से मरण तक।यानि, जन्म, यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार, हवनयज्ञ, विवाह, मृत्यु के समय व किरया-करम (मृतक संस्कार) आदि में भी मन्त्र उच्चारण का विधान है। मंत्र शक्ति का इससे अच्छा प्रमाण क्या हो सकता है। मुस्लमान भी, जन्म-मरण के समय “कुरान’ की आयतें पढते हैं। सिक्ख लोग गुरु ग्रन्थ साहिब का पाठ करते हैं। ईसाई धर्म को मानने वाले “बाईबल’ का पाठ तथा हिन्दू ‘वेद-पुराण-गीता’ और कम से कम “श्री रामचरित मानस” का पाठ अवश्य इन अवसरों पर कराते हैं। धारणा व इच्छा के अनुसार, उनको उसका फल भी मिलता है। कहना न होगा कि गीता रामायण का पाठ हो या गुरूबाणी का, कुरान की आयतों का पाठ हो या बाईबल का मेरे विचार से, ये सब मंत्र ही हैं। साधक, मन्त्रों द्वारा अपने में निहित शक्ति को प्रबल शक्ति के रूप में जागृत करके उनसे मनवांछित लाभ उठाता है।
साधक की अन्तरचेतना के माध्यम से ही, मन्त्रों की शक्ति का स्फुरण होता है तथा ये साधक के लिये चमत्कारी बन जाते हैं। मन्त्र वास्तव में, साधक व इष्टदेव को, एक दूसरे से मिलाने में सेतु (पुल) या माध्यम की भूमिका निभाते हैं या माध्यम का काम करते हैं। भगवान् निराकार होकर भी, जिस प्रकार सभी को पूजा-अर्चना व चित्र-दर्शन मात्र से एक साथ ही सभी को सुफल एवं मनवांछित फल देते हैं। ठीक उसी प्रकार, एक ही समय में, एक जैसे मन्त्रों या एक जैसे प्रभाव वाले मन्त्रों का अनेक साधकों या प्रति साधकों (जो दूसरों से, दूसरों के माध्यम से अपने लिये साधना करवाते हैं) को, इष्टदेव फल प्रदान किया करते हैं। मन्त्र साधना से, एकाग्रता प्राप्त करके मोक्षादि सोपान पर भी चढ़ना सम्भव है। मन्त्र-तन्त्र सर्वत्र व्याप्त हैं। आदमी के जीवन दर्शन से लेकर, ललित कलाओं, लेखक की कलम, चित्रकार की तूलिका, रेखाओं का खींचना तथा व्यक्ति के सोचने के ढंग तक में मन्त्र शक्ति ने अपना कार्य क्षेत्र बनाया है। अतः, कहा जा सकता है कि मंत्र में, असम्भव को संभव बना देने की शक्ति है। आवश्यकता है इसे सिद्ध करने की।

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