1.मन्त्र शब्द व्यापक अर्थ को संजोये हुये है । वैदिक ऋचाओं के छन्दों से लेकर. देवी-देवताओं की स्तुति तथा हवन में प्रयुक्त किये जाने का निश्चित शब्द विधान तथा कुरान शरीफ में आयी आयतों तक भी, मन्त्र कहा जा सकता है।

2. धर्म-कर्म और मोक्ष प्राप्ति की प्रेरणा देने वाली शक्ति भी मन्त्र कहलाती है |

3. निश्चित वर्ण-समूह, जब अपना विशेष प्रभाव दिखाकर साथ साधक या प्रति साधक को इच्छित फल प्रदान करने लगे तो, उनको भी मंत्र कहा जा सकता है ।

4. देवता के सूक्ष्म शरीर या इष्टदेव की कृपा को भी मन्त्र कहते हैं। दिव्य शक्तियों की प्राप्ति में प्रयुक्त शब्द भी मंत्र है।

5. विश्व में गुप्त शक्ति को जाग्रत करके अपने अनुकूल बनाने वाली विद्या भी मंत्र कहलाती है।

6. गुप्त शक्ति को विकसित करने वाली विद्या को मन्त्र कहते हैं।

7. निश्चित शब्द समूह द्वारा उच्चारण की गई ध्वनि भी मन्त्र कहलाती है। ध्वनि विशेषज्ञ भी, ध्वनि को विश्व ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त रूप कहते हैं। ध्वनि में छिपी विचित्र शक्ति, प्रलय (संहार) तथा सृजन (प्रसार) का कार्य करने में सूक्ष्म होती है। ध्वनि का प्रभाव, पशु-पक्षियों व मनुष्य के अतिरिक्त वनस्पति पर भी देखा जा सकता है। ध्वनि से, बांसुरी पर, जहां भगवान् कृष्ण के गाय-बछड़े रीझ जाया करते थे, वहीं सपेरों की बीन पर, आज भी साँपों को थिरकते देखा जा सकता है। संगीत की ध्वनि से, मंद बुद्धि वाले छात्रों की बुद्धि में भी वृद्धि की जा सकती है। आज कल बाजारों में, टेप-रिकार्डर की ऐसी कैसट भी आसानी से उपलब्ध हैं। पोलियो, पक्षाघात व गूंगापन जैसे रागा का उपचार भी ध्वनि से किया जा सकता है। ध्वनि से, साधक अपन भगवान देवता या शक्ति को प्रभावित कर लाभ उठा सकता है। विज्ञान भी अब. मंत्र-तंत्र का सहारा ले रहा है। पश्चिमी दशा में, मनो रोगों को दूर करने के लिये टोनों-टोटकों व मन्त्रों की उपयोगिता को स्वीकार किया जाने लगा है। विज्ञान अन्तिम सत्य नहीं है। दैविक और आध्यात्मिक शक्तियों के साथ-साथ प्रेत शक्तियाँ भी आकाश में विचरण करती हैं। इसलिये कभी लाख प्रयत्न करने पर भी, काम नहीं बनता। कभी मिनटों के समय मात्र में ही हो जाता है। ऐसे समय
पर अक्सर कहा जाता है, क्या मंत्र मार दिया कि काम बन गया।

8. “मन्त्र त्रायते यस्मात्तस्मान मन्त्र प्रकीर्त्तितः’ अर्थात् मंत्र शब्द में, ‘मन+त्र’ का शाब्दिक अर्थ इस प्रकार है। ‘मन’ अर्थात् दिल का, ‘त्र’ अर्थात् त्राण या रक्षा। इस प्रकार संक्षिप्त में यूँ कहा जा सकता है कि मंत्र वह है, जिससे किसी के मन व तन दोनों की ही रक्षा हो सके। मन व तन पर नियन्त्रण करके, साधक इसके चमत्कार (प्रभाव) से लाभ उठा सकता है।

9. मन्त्रों में विभिन्न देवताओं व शक्तियों के संकेत दिये होते हैं। विशेष नोट-एक ही शक्ति या देवता या इष्टदेव आदि को प्रकट करने हेतु जो मंत्र, ऋषि-मुनियों या देव-तुल्य महान् आत्माओं ने शब्द विधान द्वारा निश्चित किये हैं, उनमें किंचित भी परिवर्तन नहीं किया जा सकता। अन्यथा मंत्र अपनी शक्ति खो बैठते हैं। यहाँ तक कि साधक को लाभ की बजाय हानि भी हो सकती है। एक ही देवता या शक्ति को प्रकट करने हेतु, ऋषि-मुनियों ने, अलग-अलग प्रकार के मन्त्र बनाये हैं। ऋषियों ने, जिस भी शब्द-विधान द्वारा मंत्रों का निर्माण किया है। साधक को उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन करने का अधिकार नहीं है। साधक चाहे तो, अपने ढंग से, अपने ही शब्दों में स्तुति (प्रार्थना) अवश्य कर सकता है। ध्यान रहे मन्त्र-गान में श्रद्धा व शुद्धि की अधिक आवश्यकता है। हमारा विश्वास है कि श्रद्धा व शुद्धि से किया गया मंत्र अवश्य ही सिद्धि भी प्रदान करता है।

10. कुछ विशिष्ट अक्षरों व शब्दों का ऐसा संगठन, जिसका बारम्बार उच्चारण एवं संघर्षण, वातावरण में, विशेष प्रकार की विद्युत तरंगें उत्पन्न करके, साधक की इच्छित भावनाओं व अभीष्ट उद्देश्यों को पुष्ट करने लगे तो मन्त्र कहलाता है।

11. शिव और शक्ति के नृत्य से उत्पन्न कई ध्वनियाँ ही मन्त्र हैं।

12. मनुष्य जो भी कुछ बोलता है, उसकी ध्वनि और शब्दों का गुम्फन हो जाता है। उस गुम्फन से उत्पन्न विशेष लावा ही मंत्र सृष्टि का रूप बनता है।

13. मन्त्र जाप का अर्थ है बार-बार आवृत्ति। बार-बार की पुनरावृत्ति से मानव, सहज में ही निहित शक्ति को प्रकट कर लेता है। ध्वमि की यही आवृत्ति मंत्र होती है।

14. आयुर्वेद में, जिस प्रकार औषधियों का पचास बार या सौ (100) बार पुठ देने या घोटने का विधान है। ताकि उसमें अधिक पुष्टता (शक्ति) आ सके। इसी प्रकार, मंत्र (ध्वनि) की बार-बार आवृत्ति, आत्म-शक्ति को पुष्ट करने में समर्थ होती है।

15. शब्दों में निहित परमाणविक ऊर्जा को प्रकट करने वाली हमारे पूर्वजों (ऋषि-मुनियों) की साधना ही मंत्र है।

16. मंत्रों की तेजोमय शक्ति को समुच्चय कहा गया है। इसके बीजाक्षर शक्ति का पुंज कहलाते हैं।

17. समस्त ध्वनियों का वर्षों तक अनुशीलन करने के बाद कुछ विशिष्ट ध्वनियों को जब किसी विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति में सक्षम पाया गया, तभी उसे मंत्र कहा गया।

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